छई छप छई
जैसा करोगे वैसा भरना ही पड़ेगा। प्रकृति से छेड़छाड़ का खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा।। पहले तो बाज नहीं आए अपनी हरकतों से। अब क्यों चिल्ला रहे हो खुदा बचाए मुसीबतों से।। कहीं बारिश तो कहीं बाढ़ का कहर। करते रहो छई छप छई।।...
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सचिन मिश्रा
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[17 Aug 2008 11:21 AM]



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