काश बंदूक होती....
मुझे झगडा करना चाहिऐ था। दो-चार गाली भी देने की जो तमन्ना थी,वो भी दब के रह गई। मुझे याद हैं उस दिन मैं ऑफिस से घर वापस जा रहा था। साथ में भैया भी थे। ये उस दिन का सुखद संयोग ही था। आजकल संयोग भी बड़ी मुश्किल से होते हैं। नही.........होते नही बनाए जात...
[पूरी पोस्ट]
अरविंद चतुर्वेदी
12
0
0
0
0
[13 Jan 2008 20:10 PM]



Shuffle








