कागद लेखी या आँखन देखी
दिनों से सिलसिला हफ्तो में बदल गया पता ही नही चला। धीरे-धीरे खुराक बनने लगी और आज दो महीने गुजर गए हैं। रोज़ रात को फिल्म देखने की आदत हो गई हैं। कल रात भी क्या गुजरी है एक फिल्म के साथ। "धर्म" ये फिल्म का नाम है.....गंगा का घाट और उगते सूर्य के साथ...
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अरविंद चतुर्वेदी
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[12 Feb 2008 08:30 AM]



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