ख़्वाब देखें थे घर में क्या क्या कुछ
ख़्वाब देखें थे घर में क्या क्या कुछ मुश्किलें हैं सफ़र में क्या क्या कुछ फूल से जिस्म चाँद से चेहरे तैरता है नज़र में क्या क्या कुछ तेरी यादें भी अहल-ए-दुनिया भी हम ने रक्खा है सर में क्या क्या कुछ ढूढ़ते हैं तो कुछ नहीं मिलता था हमारे भी घर में क्या...
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JATINDER PARWAAZ
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[16 Jul 2009 11:33 AM]



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