"श्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविता"
कवि आज सुना वह गान रे, जिससे खुल जाएँ अलस पलक। नस–नस में जीवन झंकृत हो, हो अंग–अंग में जोश झलक। ये - बंधन चिरबंधन टूटें – फूटें प्रासाद गगनचुम्बी हम मिलकर हर्ष मना डालें, हूकें उर की मिट जाएँ सभी। यह भूख – भूख सत्यानाशी बुझ जाय उदर की जीवन में। हम व...
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विकास सैनी
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[25 Dec 2008 06:14 AM]



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