याचना

क्षितिज ह्रदय की वीथिका में, साथ तुम चलते रहो। आहत मन तुम्हें जब भी पुकारे गीत बन ढलते रहो। मन तिमिर में डूब कर, ढूंढ़े सहारा जब कभी तड़ित से चमक कर, तुम प्रभा देते रहो। और प्राची से कभी जब, झांकता हो वह अरुण, मुस्करा कर तुम सदा, संकेत बस देते रहो। किनारा मा... [पूरी पोस्ट]
writer उषा वर्मा
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[30 Apr 2009 11:27 AM]

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