आशा वसंत
विश्वा सुंदरी धरा विभूषित सुगम सरल पुश्पाभूषण से कनक रंग मय रक्त वर्ण सम विविध रंजनाभूषण से भरा हुआ है मन्द हास्य से पुलकित हुई हवा का स्वर कुसुमित हो इस नयी छटा मे कुंठित मानव मन तरुवर नयी धूप के छद्म रुप ने वृक्षों को ललकाया है कभी झूमती कभी सम्हलत...
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Paridhi Jha
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[19 Apr 2007 05:12 AM]



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