अक्स

LIFE: AS I SEE IT सपनों की नर्म परछाइयों से फिर तुम्हारा अक्स निकला धुँधला धूमिल धुला हुआ सा फिर तुम्हारा अक्स निकला पास आता है मेरे, फिर दूर क्यों रह जाता है? नर्म रुई की तरह हाथों मे चूर क्यो रह जाता है? कच्ची गुनगुनी धूप सा सर्द मन को गर्माता है सरदी की ओस मे सना ह... [पूरी पोस्ट]
writer Paridhi Jha
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[20 Apr 2007 05:44 AM]

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