कच्ची धूप
कच्ची धूप गुनगुनी धूप भोली सी अनमनी धूप अम्बर से छन-छन के गिरती करवटें सी बदलती धूप पत्तों के तन से टकराती हवा के झोंकों मे बलखाती फूलों की पंखुदी चूम कर गुलशन नए खिलाती धूप कभी मेरे आँचल से छन कर पलकों की चिलमन के नीचे कभी नाच कर कभी उफ़न कर सपने नए...
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Paridhi Jha
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[25 Jul 2007 09:18 AM]



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