अक्ल हर बार दिखाती थी जले हाथ अपने - फराज़ साहब की एक नज़्म
वहशते दिल सिला-ए-आबला पाई लेलेमुझ से या रब मेरे लफ्ज़ों की कमाई लेलेअक्ल हर बार दिखाती थी जले हाथ अपनेदिल ने हर बार कहा आग पराई लेलेमैं तो उस सुबह-ए दरख़्शां को तवांगर जाऊंजो मेरे शहर से कश्कोले गदाई लेलेतू गनी है मगर इतनी है शरायत मेरीये मोहब्बत जो ह...
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नयनसुख
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[26 Aug 2008 04:33 AM]



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