अब किसका जश्न मनाते हो, उस देश का जो तक़सीम हुआ- स्वर्गीय अहमद फराज़ की नज़्म

नयनसुख अब किसका जश्न मनाते हो, उस देश का जो तक़सीम हुआअब किसके गीत सुनाते हो, उस तन का जो दोनींम हुआउस ख़्वाब का जो रेज़ा रेज़ा उन आखों की तक़दीर हुआउस नाम का जो टुकड़ा टुकड़ा गलियों में बे तौक़ीर हुआउस परचम का जिस की हरमत बाज़ारों में नीलाम हुईउस मिट्टी का जिस क... [पूरी पोस्ट]
writer नयनसुख
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[26 Aug 2008 11:31 AM]

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