हबीब

कुछ पन्ने मेरी दराज़ से.... आशकार करो चाहे जितना, अफ़कार मिटा दो चाहे जितना. मुंतज़िर बैठे हैं राहों में तेरी, अलहदा करदो चाहे जितना। रम्ज़-शिनास थे तुम हमारे, ग़म-गुसार थे तुम हमारे. क्या हुआ जो चल दिए यूँ, रकीब तो न थे तुम हमारे? गुल तो यूँ रोज़ मिलते हैं, ख़ार बस किस्मत से मिल... [पूरी पोस्ट]
writer ●๋• नीर ஐ
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[06 Aug 2009 12:39 PM]

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