तेरा आना...

कुछ लम्हे दिल से... इक तेरे आने से ... ए जाने बहार ... जिन्दगी बन गई है सावन की फुहार सिमटी सी थी जिंदगी बिन उमंग बिन तरंग अपनें आगोश में लिए तनहाइयों की चुभन साँसें थी पर खुशबू नहीं दिल था पर धड़कन नहीं होली थी पर वो रंग सुर्ख नहीं दीवाली थी पर नूर - ए - रोशन नहीं ईद थ... [पूरी पोस्ट]
writer अर्चना तिवारी
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[23 Jun 2009 03:22 AM]

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