पचा रही है देश को, शाकाहारी आँत
समकालीन दोहे धरती ने हमको दिया, आम और अमरूद। हमने धरती को दिया, तोप और बारूद॥ बंदूकों से खेलकर, गली हुई शमशान। जली ठूँठ पर बैठकर, कौआ पढ़े अज़ान॥ राजा अपनों से करे, कैसा बुरा सुलूक़। पहले बाँटे सरहदें, फिर बाँटे बंदूक॥ उसके पन्नों में नहीं प्यादों का उल...
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ओम द्विवेदी
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[06 Sep 2009 15:42 PM]



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