राग ललित-राशिद ख़ाँ
डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे ज़र्द सा चेहरा लिये चाँद उफ़क़ पर पहुँचे दिन अभी पानी में हो,रात किनारे के क़रीब न अँधेरा,न उजाला हो,न ये रात न दिन…… गुलज़ार की इस नज़्म के समय ही बजता है राग ललित । ये तो ख़ैर मेरी अपनी बात है जिसका कोई प्रमाण नही...
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पारूल
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[27 Nov 2008 06:00 AM]



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