राग हंसध्वनि-लागी लगन पति सखी संग,-राग हंसध्वनि
एक लम्स हल्का सुबुक और फिर लम्स-ए-तवील दूर उफ़क़ के नीले पानी में उतरे जाते हैं तारों के हुजूम और थम जाते हैं सय्यारों की गर्दिश के क़दम ख़त्म हो जाता है जैसे वक़्त का लंबा सफ़र तैरती रहती है इक ग़ुंचे के होंटों पे कहीं एक बस निथरी हुई शबनम की बूँद तेरे होट...
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पारूल
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[05 Dec 2008 08:05 AM]



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