हिंदी नै पूछा , अनाथ क्युं हूँ मै
अभी कल एक पुस्तक की दुकान मे कुछ लेने गया तो लगा की हिंदी पुस्तकों की दुकान मे हिंदी पुस्तकों के बीच मे रखी अंग्रजी की कुछ पुस्तके बड़ी इठला रही है , जैसे देशी लोगो के बीच मे कोई सूट-बूट पहने कोई परदेशी बैठा हो , दुकान मे सबसे बढ़िया जगह भी इन्ही को...
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प्रशांत गुप्ता
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[14 Jul 2009 08:07 AM]



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