क्षणिकायें
रात और दिन रात झुक जाती है दिन के कंधे पर दिन उसे लिये फिरता है फिर थक जाता है रात की नींद खुल जाती है दिन को थपकाती है सहलाती और सुलाती है खुद एक आंख में सारी रात काट देती है कौन कहता है कि दिन का विलोम रात है। उदासी और मुस्कान मैंने जब भी पूछा उसकी...
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अमरेन्द्र:
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[01 Mar 2009 19:04 PM]



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