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पास आओ तुम जरा मैं ज़िन्दगी से प्यार कर लूँ । तुमसे अपने सुख दुखों की , बातें भी दो चार कर लूँ । हर कदम और हर डगर पर , जीत मेरी ही रही है । प्रशंसा के पुष्प पाए , चोट मैंने कब सही है ? किंतु तुमसे मिल के जाना, हर में भी सुख कहीं है । इस निरर्थक जीत क...
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सीमा रानी
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[04 Feb 2009 11:48 AM]



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