झाड़े रहौ कलक्टरगंज...
हम पंचै जब ते गांव छोड़ि के शहर में पढ़ाई करै पहुंचेन, गांव देहात की बोली छोड़ि क खड़ी बोली ब्वालै लागेन। गांव वाले दादा की पहली बहुरिया तक तो सब कोई देहाती ही म ब्वालत रहा। लेकिन, जइसेहे गांव म दूसरि बहुरिया लखनऊ त आई, सबका जइसे खड़ी बोली का भूत सवा...
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पंकज शुक्ल
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[25 Sep 2008 17:44 PM]



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