यह किसान की दुनिया
जमींदार कुतवा अस नोचैं देह की बोटी-बोटी, नौकर प्यादा औरु करिन्दा ताके रहै लंगोटी। पटवारी खुरचाल चलावैं बेदखली इस्तीफा, रोजई कुड़की औ जुर्माना छिन-छिन नवा लतीफा। मोटे-झोटे कपड़ा-बरतन मोटा-झोटा खाना, घर ते खेत ख्यात ते बग्गरू कहूं न आना जाना। नंगा ठग्गा...
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पंकज शुक्ल
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[28 Sep 2008 07:46 AM]



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