बेबसता की छलक
हट साले..रोज-रोज चला आता है भिख मांगने। तेरे मां-बाप नहीं है क्या? वह चिढ़ते हुए कहा। हर दिन हराम की कमाई खाने की आदत है साले को। ऐसे लोगों की न जात का पता होता है न घरवालों का! ऐ तो अपने जन्म का भोग रहे हैं। ऐसे कहने वाले वही साहब थे, जो हर रोज स्टे...
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monikashekhar
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[28 Dec 2008 02:24 AM]



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