कहने को मैं जिए जा रहा हूं

जाते-जाते... कहने को मैं जिए जा रहा हूं हर घड़ी आंसूं पिए जा रहा हूं नहीं हर तरफ सन्नाटा मेरे फिर भी ख़ामोशी से कहे जा रहा हूं खुद ही जो कहते थे वो मेरी अनकही बातें तलाश में उनकी मैं पागल हुए जा रहा हूं हैं तैर कर चले गए वो दूर कहीं शायद मैं दरिया में मोहब्बत के... [पूरी पोस्ट]
writer vikas vashisth
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[16 Sep 2009 10:03 AM]

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