कवि की कल्पना ...

मेरी डायरी के पन्ने... सुबह के 4 बज रहे हैं ... इतनी तड़के भी स्टेशन पर जैसे भगदड़ मची हुई है। स्टेशन के गेट पर जबरदस्त पहरा है ... एनएसजी तैनात है ... स्निफर डॉग जहां - तहां सूंघ रहे हैं ... औऱ पब्लिक जैसे एक ही ट्रेन से नि कल जाने को बेताब है। दिल्ली जैसे शहर में सुबह -... [पूरी पोस्ट]
writer हेमन्त वशिष्ठ
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[12 Jun 2009 03:44 AM]

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