कवि की कल्पना... पार्ट-2 (मोहब्बत की मेट्रो)

मेरी डायरी के पन्ने... मोहब्बत की मेट्रो ... ये नाम दिया बंधु जिंदल साहब ने। दरअसल कुछ महीने पहले मैं रुटीन के मुताबिक ऑफिस आ रहा था , डीयू से मेट्रो पकड़ी। कश्मीरी गेट पहुंचा तो भीड़ का रेला ट्रेन को धकियाते भीतर आ घुसा। इस रेले में अपने जिंदल साहब भी थे , डिब्बे में उनकी... [पूरी पोस्ट]
writer हेमन्त वशिष्ठ
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[09 Jul 2009 16:01 PM]

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