विडंबना

मेरी डायरी के पन्ने... एक पुरानी रचना है, आज भी सोचने पर अक्सर मजबूर कर देती है)... बाल बेतरतीब थे... अटपटी सी चाल चलते, रास्ते पर बिखरे कंकड़ों को ठोकर मारते, अनमने से यूंही, जाने किस उधेड़बुन में, बेतहाशा... पागलों की तरह, अपने आप से बातें करते, हम निरंतर चले जा रहे थे..... [पूरी पोस्ट]
writer हेमन्त वशिष्ठ
views
3
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
0
[09 Jul 2009 16:00 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix