हम ऐसे जीते हैं...
मेरे दफ़्तर में सीढ़ियां नहीं हैं... लोग लिफ्ट से चढ़ते हैं... हमारी इस दुनिया में ... ताज़ी हवा के लिए खिड़कियां नहीं है... हम शीशे के पार... पेड़ों के पत्तों को हिलते हुए देखते हैं... शीशे के पार देखकर... सर्दियों में धूप सेकते हैं... पहली बरसात के...
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हेमन्त वशिष्ठ
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[09 Jul 2009 16:00 PM]



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