कोई शीर्षक मिला ही नहीं...
मैं अपने कम्प्यूटर के मॉनीटर में मानो घुसा पड़ा था... और वो जाने कब से चुपचाप... सहमा हुआ सा... मेरी कुर्सी के पास खड़ा था... आंख उठा कर मैने देखा... क्या बात है भाई... धीरे से उससे पूछा... पर वो मेरे सवालों को शायद सुन भी नहीं सका था... दिन भर की थक...
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हेमन्त वशिष्ठ
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[15 Aug 2009 01:26 AM]



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