ग़ज़ल

जरा सोचो है व‍क्‍़त अभी भी संभल जा इस दलदल से बचके निकल जा नही निवाला मिलनेवाला पानी के दो घूँट निगल जा कहता है ये बदला मौसम कल की मैली शकल बदल जा किसी कुँवारे ख़याल की तरह आकर दिल मे खूब मचल जा उम्रभर न उलझ खिलौनो से घडी दो घडी यूंही बहल जा रूई जैसा दबता क्य... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ.श्रीकृष्ण राऊत

ग़ज़ल

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[27 Mar 2008 13:09 PM]

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