ज़रा सोचो
कभी ये दिन भी आयेगा ज़रा सोचो कली को फूल खायेगा ज़रा सोचो सभी को रौंदते निकला बेरहमी से कहाँ पर रथ ये जायेगा ज़रा सोचो मिलेंगे ना तुम्हे माने किताबो मे तजुर्बा साथ लायेगा ज़रा सोचो बचाओ रोशनी थोडी वफा़ओ की घना अंधेर छायेगा ज़रा सोचो नही है याद दिल्ल्...
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डॉ.श्रीकृष्ण राऊत
ग़ज़ल
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[09 Feb 2008 10:31 AM]



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