रोटी के अजगर ने

जरा सोचो रोटी के अजगर ने निगली हयात आधी चबाली उसूलो ने बाकी हयात आधी आज बाप को लटके देखा बेटी ने जब दिल के दिल मे गयी लौटके बरात आधी उसे मनाते पलके बोझल हुई चाँद की करवट बदले रही जागती जो रात आधी जुल्फे,रिश्ते,धरम,किताबे नाम कैद के रिहा हुये तो हरदम पायी निज़ा... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ.श्रीकृष्ण राऊत

गज़ल

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[21 May 2008 03:10 AM]

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