खुश्बुओं को जहाँ तुम चले हार के .........( ग़ज़ल )

अनुरक्ति खुश्बुओं को जहाँ तुम चले हार के ! थे वहीं पर बहुत पेड़ कचनार के !! आरहा है घटाओं का मौसम मगर ! झेल थोड़े से तेवर भी अंगार के !! इक थपेडे ने आकर कहा नाव से ! कितने थोथे भरोसे हैं पतवार के !! डूबना ही मुकद्दर में जब तय हुआ ! देखलें हौसले हम भी मझधार के... [पूरी पोस्ट]
writer ललितमोहन त्रिवेदी

ग़ज़ल

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[19 Jul 2008 07:24 AM]

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