औरत ( ग़ज़ल )
नदी की धार चट्टानों पै जब आकर झरी होगी ! तभी से आदमी ने बाँध की साजिश रची होगी !! तुझे देवी बनाया और पत्थर कर दिया तुझको ! तरेगी भी अहिल्या तो चरण रज राम की होगी !! मरुस्थल में तुम्हारा हाल तो उस बूँद जैसा है ! जिसे गुल पी गए होंगे जो काँटों से बची ह...
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ललितमोहन त्रिवेदी
ग़ज़ल
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[20 Oct 2008 12:31 PM]



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