उपालंभ ( उलाहना )............गीत

अनुरक्ति यह गीत उस उम्र का है जब किसी की राई जैसी उपेक्षा भी पर्वत से बड़ी महसूस होती है !विदा के क्षणों में आँखों का न डबडबाना भी फांस बनकर आंसने लगता है ! कच्चेपन का पक्का गीत ....... यदि तेरे नत नयनों में भर आता नीर नमन का ! तो इतना एहसास न होता एकाकी जीवन... [पूरी पोस्ट]
writer ललितमोहन त्रिवेदी
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[16 Dec 2008 10:13 AM]

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