लो आ गए अपनेराम

सच को सलाम चम्बल के सब भईयन को अपनेराम की राम-राम। अपने भईयन से मिलवे को बहुत दिना से मन हतो, मगर का करते नौकरी के फेर में ताल-तलैयन की नगरी में पहुंच गए। अपने आप में इतने उलझ गए कि भईयन के बारे में सोचऊ न पाए। खैर, गुस्ताखी माफ। अब आपको शिकायत का मौका नहीं दें... [पूरी पोस्ट]
writer Manoj Pamar
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[03 Oct 2008 08:44 AM]

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