हाय मुफ़्त होते बदनाम…, काहे को हाय ?

बस, सिर्फ़ दो मिनट ... एक अधीर फुसफुसाहट.., “ कौन है, अंदर ? “ फ़ौरन ही जवाब मिलता है, एक खीझभरी जम्हुँआई के साथ.., “ अरे यार कोनो बैग-वाला घुसा बैठा है, तब से ! “ घड़ी पर एक उचटती निग़ाह डालते हुये अपना ग़ुबार निकालता है, “ झोला भर के दवाई ले गवा है..डाक्टरवा के फुसलावत होई,... [पूरी पोस्ट]
writer डा० अमर कुमार
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[15 Jul 2008 17:52 PM]

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