मै उंगली थामे चलता हूँ...
बचपन तो कब का बीत गया, पर स्वप्नों से मन छलता हूँ कहीं दूर क्षितिज पर यादों की मै उंगली थामे चलता हूँ | मेरे मन में भी फूटे हैं कुछ भावों के नटखट अंकुर, शब्दों की अर्ध सुप्त कलिका खिल जाने को अब है आतुर | नवपत्रों पे झिलमिल झिलमिल बूंदे बन कर मै ढलता...
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राकेश
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[07 Feb 2009 20:15 PM]



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