रात और मदिरा
अग्नि पिघल के जल हुई प्रेम सुधा की बूंदे मिली, मदिरा बनी छलक पड़ी भर गई दो चमकती आँखों में आंखे चार हुई धूप छाँव में समा गई चाँद ने अंगडाई ली, पलकें झुक गयीं प्यास और मदिरा एक होने लगे प्रकृति ने नयन मूँद लिए शांत, स्तब्ध चाँद नीरवता की हलचल निहारता र...
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राकेश
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[02 Mar 2009 11:08 AM]



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