होली और हंगामा

Kavi Sparsh रंगों की धुंधली परछाईं मन आंगन में घूम गई कुछ गुजरे वक़्त की नटखट सी बातें मानस को चूम गयीं अब कुछ ही दिन बाकी हैं मस्ती और हल्ले गुल्ले में फ़िर वही पुरानी टोली और फ़िर से हुडदंग मुहल्ले में कोई नई शरारत सूझेगी, उत्साह भरा हर पल होगा मेरे रंगों की बौछा... [पूरी पोस्ट]
writer राकेश
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[08 Feb 2009 11:10 AM]

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