अनंत प्रतीक्षा

Kavi Sparsh शाम हो चली धुंधली धुंधली, छूट गया आशा का अंचल ओंस रात की बन कर आंसू, पलकों से अब चली निकल सरक रहा है रेत रेत सा, समय हाथ से हर क्षण हर पल धुंआ धुंआ हो धीरे धीरे, घुल गए सब सपनों के बादल रात हो गई कितनी लम्बी, शांत पड़े सब तारा मंडल अंधियारे में भटक भट... [पूरी पोस्ट]
writer राकेश
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[14 Mar 2009 07:39 AM]

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