कितना मधुरिम चंचल प्रभात - एक संस्कृतनिष्ट कविता का प्रयास
कितना मधुरिम चंचल प्रभात मंद मंद घूंघट उतार, केशों का नैसर्गिक श्रृंगार उषा विहंसी कर नयन खोल, हो गए रक्तवर्णी कपोल बाला का कोमल सरस गात कितना मधुरिम चंचल प्रभात। दे रहा दूत सबको संदेश, हो रहा दिवाकर का प्रवेश अरि करते गुंजित ह्रदय तार, करने को स्वाग...
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राकेश
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[16 Mar 2009 09:22 AM]



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