लक्ष्य और दुविधा...

Kavi Sparsh मन माला सब बिखर रही है गीत कौन सा मै गाऊँ बढ़ा कारवां लक्ष्य साध , मन दुविधा में , क्या रुक जाऊं ? सिमट सिमट के रह जाएगा , काल चक्र की परतों में बस बुना बटोरा तिनका तिनका रिश्तों का हर ताना बाना। धर्म कर्म कर्तव्य में उलझी अभिलाषा की जंजीरों से , मुक... [पूरी पोस्ट]
writer राकेश
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[16 May 2009 12:25 PM]

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