मन की बात
फूल अपने हृदय का खिल जाए; चाक दामन भी हो तो सिल जाए; और कुछ चाहिए न फिर मुझको; स्नेह यदि साथियों का मिल जाए। आरज़ू ये नहीं कि छा जाएं; चाहते बस यही कि भा जाएं; ज़िंदगी हो गई सफल समझो; काम गर हम किसी के आ जाएं। तुम कहीं और हम कहीं होंगे; किंतु दिल से...
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Hemant Snehi
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[01 Oct 2008 10:06 AM]



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