शाम नहीं ठहरी
फिसली सुर्ख सुबह मुट्ठी से,रुकी न दोपहरी; लाख मनाया पर निर्मोही शाम नहीं ठहरी । सिमट गयी सांसों में लाखों सूरज की गरमी; चुभने लगी बदन में रजनीगंधा की नरमी; दिन बीता उथला-उथला पर रात हुई गहरी। फिसली सुर्ख सुबह मुट्ठी से, रुकी न दोपहरी। यादें जागी-जागी...
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Hemant Snehi
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[17 Jul 2008 14:30 PM]



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