आप से आंखें हमारी लड़ गईं
आप से आंखें हमारी लड़ गईं; दिन हुए छोटे कि रातें बढ़ गईं। ज़िदगी की ओढ़नी पर प्रेम की; बूटियां कितनी न जाने कढ़ गईं। खिल उठी मन की कली मधुमास में; पत्तियां सूखी हुई सब झड़ गईं। ज़िंदगी में आप की परछाइयां; इंद्रधनुषी चित्र कोई जड़ गईं। अब न आंखों को ल...
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Hemant Snehi
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[17 Sep 2008 14:13 PM]



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