हर तरफ़ लगता चमन जलता हुआ (ग़ज़ल)
हर तरफ़ लगता चमन जलता हुआ, आदमी को आदमी छलता हुआ। हो गया हर लक्ष्य बौना इस तरह, बर्फ जैसे धूप में गलता हुआ। हो न पाया जो कभी साकार वो, ख्वाब आंखों में रहा पलता हुआ। घोषणाओं पर अमल होता नहीं, देखिए हर फ़ैसला टलता हुआ। जो गया दरबार खाली हाथ ले, लौट आया...
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Hemant Snehi
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[19 Sep 2008 14:40 PM]



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