कुछ यूं हुई थी जनचेतना की शुरुआत...
उन्नीस वर्ष पहले कुछ लोगों ने जनस्वप्नों को लंबी उम्र और कल्पनाओं को पंख प्रदान करने वाली किताबों को जन-जन तक पहुंचाने की जरूरत महसूस की। झोलों में किताबें लेकर घरों-दफ्तरों-कालेजों में जाने से शुरुआत हुई और फिर कारवॉं आगे बढ़ता गया। जनता से सहयोग ले...
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Sankalp
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[24 Jan 2008 03:20 AM]



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