दोपहर के अलसाये पल
तुम्हारी समँदर -सी गहरी आँखों में, फेंकता पतवार मैं, उनींदी दोपहरी में - उन जलते क्षणों में, मेरा ऐकाकीपन और घना होकर, जल उठता है - डूबते माँझी की तरह - लाल दहकती निशानीयाँ, तुम्हारी खोई आँखों में, जैसे "दीप ~ स्तंभ" के समीप, मँडराता जल ! मेरे दूर के...
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अनिल दुबे
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[25 Mar 2007 05:15 AM]



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