हम बात तुम्हारी क्यों मानें ?
कुछ रंग नहीं, कुछ माल नहीं कुछ मस्ती वाली बात नही कुछ खर्च करो, कुछ ऐश करो कुछ डांस करें, कुछ हो जाए ! जब मौज नहीं कोई धूम नहीं , तब बात तुम्हारी क्यों माने ? क्या कहते हो ? क्या करते हो है ध्यान कहाँ ? कुछ पता नहीं ना टाफी है, ना चाकलेट , ना रसगुल्ल...
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सतीश सक्सेना
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[13 Aug 2008 02:57 AM]



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