हम बुलबुल मस्त बहारों की, हम बात तुम्हारी क्यों मानें ?
जब से व्याही हूँ साथ तेरे लगता है मजदूरी कर ली बर्तन धोये घर साफ़ करें बुड्ढे बुढ़िया के पैर छुएं, फूटी किस्मत, अरमान लुटे, अब बात तुम्हारी क्यों माने ? ना नौकर हैं, न चाकर हैं न ड्राईवर है, न वाचमैन, घर बैठे कन्या दान मिला ऐसे भिखमंगे चिरकुट को, चौकीद...
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सतीश सक्सेना
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[01 Oct 2008 13:00 PM]



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